परमेश्वर के वादों का उद्देश्य

House of Prayer
May 22 · 1 minute read

क्योंकि उसके ईश्वरीय सामर्थ ने सब कुछ जो जीवन और भक्ति से सम्बन्ध रखता है, हमें उसी की पहचान के द्वारा दिया है, जिस ने हमें अपनी ही महिमा और सद्गुण के अनुसार बुलाया है। जिन के द्वारा उस ने हमें बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाएं दी हैं: ताकि इन के द्वारा तुम उस सड़ाहट से छूट कर जो संसार में बुरी अभिलाषाओं से होती है, ईश्वरीय स्वभाव के सहभागी हो जाओ।(2 पतरस 1:3-‬4 )‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬

ऊपर लिखित वचनों में दो बातें महत्वपूर्ण है, उसके ईश्वरीय सामर्थ ने हमें दिया है, एवम परमेश्वर ने हमें दिया है। हमारे पास जो भी है वह परमेश्वर की तरफ से है।

क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिस में न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, ओर न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है। (याकूब 1:17)

परमेश्वर ने हमें क्याक्या दिया है

  1. उसके ईश्वरीय सामर्थ ने सब कुछ जो जीवन और भक्ति से सम्बन्ध रखता है।
  2. परमेश्वर ने हमें बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाएं दी हैं।

परमेश्वर का एक विशिष्ट लक्ष्य है कि हम उसके दिव्य स्वभाव के सहभागी और प्रतिभागी बनें।

यद्यपि परमेश्वर ने हमें महान उद्देश्यों के लिए आशीषें दी, पर हम अपने लक्ष्य बहुत ही छोटे रखते हैं कि किसी तरह हम यहां से ही ठीक ठाक जीवन बिता कर स्वर्ग में पहुंच जाएं।

परमेश्वर के प्रावधानों के उद्देश्य होते हैं

वह प्रावधान हैं

  1. (2 पतरस 1:3) उसके ईश्वरीय सामर्थ ने हमें वहसब दिया है जो एक ईश्वरीय जीवन जीने के लिए चाहिए। जीवन और भक्ति अलग-अलग कम्पार्टमेंट नहीं है। 6 दिनों के लिए जीवन और एक दिन रविवार के लिए भक्ति नहीं है।

क्या है इश्वरीय सामर्थ? वह है मृत्युंजय की वह सामर्थ है जो पवित्र आत्मा ने हमारे साथ बांटी है।

परन्तु जब कि परमेश्वर का आत्मा तुम में बसता है, तो तुम शारीरिक दशा में नहीं, परन्तु आत्मिक दशा में हो। यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं। (रोमियो 8:9)

  1. परमेश्वर के बहुमूल्य और शानदार वायदे (2 पतरस 1:4) परमेश्वर ने हमें बहुमूल्य वायदे दिए हैं पर हमारा ध्यान है कि हम उसका इस्तेमाल सांसारिक अभिलाषाओं के लिए करते हैं।

हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो, कि उस ने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आशीष दी है। (इफिसियों 1:3)

परमेश्वर के वचन का उद्धेश्य है, उसकी आशीष है और उसके वायदे। पतरस कहता है, कि हम परमेश्वर के रूप में मनाए गए ताकि हम परमेश्वर के चरित्र के भी सहभागी बन सके परंतु पाप ने हमें आदम के चरित्र का बना दिया। पर परमेश्वर ने अपना एकलौता पुत्र यीशु को दिया जिसने हमें लहू से छुड़ाया और अपने स्वरूप में परिवर्तित कर रहे हैं।

लक्ष्य केसाथयात्रा

मसीह जीवन एक ऐसा यात्रा है, जिसके बहुत विशिष्ट लक्ष्य है। यदि हम बिना लक्ष्य के सफर करते हैं तो हम अपना बहुमूल्य समय बर्बाद कर रहे हैं। यह सफर हमेशा आरामदायक नहीं होता, हमें कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है पर आनंद की बात यह है कि वह हमें लक्ष्य की ओर लेकर जाता है। हमारी समस्या यह है कि हम लक्ष्य के बजाय, सफर पे और उसके दौरान अपने आराम के ऊपर, ध्यान देते है। जिसका निष्कर्ष होता है हम में तनाव, प्रतिस्पर्धा, कुंठा, निराशा इत्यादि। यदि सफर कटना ही हमारा लक्ष्य है तो वह एक दुखद स्थिति हो जाती है।

अंतिम दिनों के बारे में यीशु के बोल (लूका 17:26-‬28)‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬

जैसा नूह के दिनों में हुआ था, वैसा ही मनुष्य के पुत्र के दिनों में भी होगा। जिस दिन तक नूह जहाज पर न चढ़ा, उस दिन तक लोग खाते-पीते थे, और उन में ब्याह-शादी होती थी; तब जल-प्रलय ने आकर उन सब को नाश किया। और जैसा लूत के दिनों में हुआ था, कि लोग खाते-पीते लेन-देन करते, पेड़ लगाते और घर बनाते थे।

कार्य: खाना-पीना, लेन-देन, पेड़ लगाना और घर बनाना। इनमें कुछ गलत कार्य नहीं है, फिर क्या गलत है?

  1. अपनी बुलाहट और चुनने का कारण भूल गए: रोज की दिनचर्या की होड़ में, अनंत काल के जीवन के मूल्य को भूल गए

(1 पतरस 2:9) पर तुम एक चुना हुआ वंश, और राज-पदधारी याजकों का समाज, और पवित्र लोग, और (परमेश्वर की ) निज प्रजा हो, इसलिये कि जिस ने तुम्हें अन्धकार में से अपनी अद्भुत ज्योति में बुलाया है, उसके गुण प्रगट करो।

  1. सफर पर ध्यान देने के कारण लक्ष्य को भूल जाना: उदाहरण के तौर पर हम देखते हैं मिस्र से प्रतिज्ञा देश की यात्रा

वहां पर दो वायदे किए गए थे, पहला मिस्र देश से निकालना और दूसरा प्रतिज्ञा के देश में लेकर जाना।

पहला वादा उत्तम और रोमांचित था, लाल समुद्र का पार करना, दुश्मनों का खात्मा, स्वर्ग से मन्ना गिरना, आग और बादल का खंबा।

पर जब उन्होंने चुनौतियों का सामना किया, तब वे भूल गए कि परमेश्वर जो पहले वादे को पूरा करने में सक्षम था वह दूसरे वादे को भी पूरा कर सकता है। जिसका परिणाम निकला अविश्वास, संदेह और असंतोष जिसके चलते ज्यादातर लोग लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाए।

12 भेदियों में से 10, अर्थात बहुमत ने कहां की प्रतिज्ञा का देश बहुत ही अच्छा है पर हम वहां नहीं जा सकते। उन्होंने कहा वायदा उत्तम है पर हम तो मनुष्य हैं हमारे लिए यह पाना असंभव है।

सिर्फ यहोशू और कालेब ने लक्ष्य पर ध्यान रखते हुए कहा कि यह संभव है। पौलूस हमे चेतावनी देता है, (1 कुरिन्थियों 10:11) परन्तु यें सब बातें, जो उन पर पड़ी, दृष्टान्त की रीति पर भी: और वे हमारी चेतावनी के लिये जो जगत के अन्तिम समय में रहते हैं लिखी गईं हैं।

इससे हम क्या सीखते हैं: चुनौतिया और कठिनाइयां से हम हताश न हो, वह हमारे मार्ग का हिस्सा है।

पौलूस कहते हैं कि हमारे मार्ग में आए हर चीज को परमेश्वर भलाई में बदलता है। और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात उन्हीं के लिये जो उस की इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।

(रोमियो 8:28)

इसका अर्थ यह नहीं है कि अगर आपकी नौकरी जाएगी तो आपको उससे ज्यादा तनख्वाह वाली नौकरी मिलेगी। लक्ष्य है कि हम परमेश्वर के स्वरूप एवं चरित्र में ढलते जाएं। जैसे की पतरस कहता है कि जीवित परमेश्वर की दैवीय स्वभाव के सहभागी बनें।

व्यवहार बनाम स्वभाव या चरित्र

हमारे व्यवहार को निरंतर अभ्यास के द्वारा विकसित किया जा सकता है। सरकारी नौकरी मे भी पदोन्नति होती है अच्छे कार्य करने पर। हमने भी देखते हैं कि कैसे कंपनियां या बैंक अपने कर्मचारियों को अच्छा व्यवहार सिखाती है, वह मुस्कुराकर आदर से बातें करते हैं चाहे अंदर से कुढ रहे हो या घर से लड़ाई करके आए हों। कलिसिया में भी हम देखते हैं कोई परिवार घर में लड़ाई करके भी आया हो तब भी अच्छा व्यवहार करते हैं ताकि लोगों के सामने गवाही खराब ना हो। स्वभाव और चरित्र में पवित्र आत्मा कार्य करता है और वह परिवर्तन हमारे भीतर से आता है। सो हम सभी अपने खुले मुख के साथ दर्पण में प्रभु के तेज का जब ध्यान करते हैं तो हम भी वैसे ही होने लगते हैं और हमारा तेज अधिकाधिक बढ़ने लगता है। यह तेज उस प्रभु से ही प्राप्त होता है। यानी आत्मा से। (2 कुरिन्थियों 3:18)

कुछ लोग कहते हैं कि मेरा चरित्र बदल नहीं सकता वह मुझे मेरे पिता से या मेरे दादा से मिला है, उस बात का जवाब यह है कि आप पवित्र आत्मा के नेतृत्व के अधीन आए, समर्पित हो जाएं। शिल्पकार पत्थर के टुकड़े को काट काट कर एक सुंदर कला में बदलता है वह पत्थर का टुकड़ा पूरी तरह से समर्पित होता है। हमारे जीवन में संघर्ष परमेश्वर की अनुमति से आते हैं। और हर एक परीक्षा हमे बढ़ाती है।

वह व्यक्ति धन्य है जो परीक्षा में अटल रहता है क्योंकि परीक्षा में खरा उतरने के बाद वह जीवन के उस विजय मुकुट को धारण करेगा, जिसे परमेश्वर ने अपने प्रेम करने वालों को देने का वचन दिया है। (याकूब 1:12)

धर्म कहता है कि यह तुम्हारी किस्मत है। क्योंकि तुम यह जानते हो कि तुम्हारा विश्वास जब परीक्षा में सफल होता है तो उससे धैर्यपूर्ण सहन शक्ति उत्पन्न होती है। (याकूब 1:3)

हमारे विश्वास को सवालों की सूची से नही बल्कि परीक्षाओं से परखा जाता है।

धन्य है वह व्यक्ति जो परीक्षाओं में धीरज रखता है।

हमेशा परीक्षा के सामने दो विकल्प रहते हैं हमारे पास,

  1. हम प्रार्थना करें की परमेश्वर हमें परीक्षाओं के संघर्ष से निकाल दे। हम कभी कभी कहते हैं कि मेरे जैसे संकट किसी के भी जीवन में नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि संकट के खत्म होने के बाद, मैं परमेश्वर के लिए कार्य करूंगा। दोनों ही हालात में जवाब है ‘नहीं’। एक संकट खत्म होगा तो दूसरा आएगा।
  2. या फिर यीशू की तरह प्रार्थना करें कि परमेश्वर तेरा नाम की महिमा हो। हे पिता, अपने नाम को महिमा प्रदान कर!” तब आकाशवाणी हुई, “मैंने इसकी महिमा की है और मैं इसकी महिमा फिर करूँगा।” (यूहन्ना 12:28)

हमें क्या करना चाहिए इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए?

दुष्टमंशा से उत्पन्न हुए भ्रष्टाचार से भागें। इन्हीं के द्वारा उसने हमें वे महान और अमूल्य वरदान दिये हैं, जिन्हें देने की उसने प्रतिज्ञा की थी ताकि उनके द्वारा तुम स्वयं परमेश्वर के समान हो जाओ और उस विनाश से बच जाओ जो लोगों की बुरी इच्छाओं के कारण इस जगत में स्थित है। (2 पतरस 1:4)

दुष्टमंशा हमारे परिवार और कलीसिया को भ्रष्ट कर देती हैं। हमारे जीवन में प्रतिस्पर्धा, व्यभिचार एवं ईर्ष्या को उत्पन्न करती है।हमारे स्वयं और शरीर की मृत्यु होनी है।

मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि जब तक गेहूँ का एक दाना धरती पर गिर कर मर नहीं जाता, तब तक वह एक ही रहता है। पर जब वह मर जाता है तो अनगिनत दानों को जन्म देता है। (यूहन्ना 12:24)

यदि गेहूँ का एक दाना एक सुंदर बर्तन में सालों तक पड़ा रह सकता है पर अगर वही दाना जमीन पर गिरे तो वह मर जाता है और अनगिनत दानों को जन्म देता है।

यह वचन विश्वास के योग्य है कि: यदि हम उसके साथ मरे हैं, तो उसी के साथ जीयेंगे, (2 तीमुथियुस 2:11)

यदि हमारा स्वयं क्रूस पर चढ़ा हुआ है तो यीशु मसीह हमारे जीवन के सिंहासन पर है यदि हमारे जीवन के सिंहासन पर हमारा स्वयं है तो यीशु मसीह अब भी क्रूस पर ही है।

सो इसलिए अपने विश्वास में उत्तम गुणों को, उत्तम गुणों में ज्ञान को, ज्ञान में आत्मसंयम को, आत्मसंयम में धैर्य को, धैर्य में परमेश्वर की भक्ति को, भक्ति में भाईचारे को और भाईचारे में प्रेम को उदारता के साथ बढ़ाते चलो। क्योंकि यदि ये गुण तुममें हैं और उनका विकास हो रहा है तो वे तुम्हें कर्मशील और सफल बना देंगे तथा उनसे तुम्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह का परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त होगा। (2 पतरस 1:5-‬8) ‬‬‬‬‬‬‬

आठ बातें जो हमारे लक्ष्य तक पहुंचती है: परमेश्वर के इश्वरीय स्वभाव में सहभागिता

जैसे हम की बिल्डिंग का निर्माण करते हैं पत्थर के ऊपर पत्थर रखते हुए

  1. विश्वास: इब्रानियों 11:6 विश्वास ही मूल है।
  2. नैतिक उत्कृष्टता: सही चीज करने की हिम्मत चाहे कितना भी पाप करने का दबाव या प्रलोभन हो। यदि हमें परमेश्वर यीशु पूछें हमें यीशु का स्वभाव चाहिए या शैतान का तो हम निश्चय ही कहेंगे कि हम यीशु का स्वभाव चाहिए। ऐसा ही हमें हर समय अपने आप से पूछना चाहिए जब भी हम किसी प्रलोभन में पडते हैं। उस समय हमें यूसुफ के उदाहरण से सीखना चाहिए।
  3. परमेश्वर और उसके वचन का ज्ञान। हम जब हम परमेश्वर के वचन का मनन करते हैं तब हम यीशु की महिमा को देखेंगे ।
  4. आत्म संयम (1 कुरिन्थियों 9:25) किसी खेल प्रतियोगिता में प्रत्येक प्रतियोगी को हर प्रकार का आत्मसंयम करना होता है। आत्म संयम आत्मा का फल है। वे एक नाशमान जयमाल से सम्मानित होने के लिये कितनी मेहनत करते हैं। और हम जानते हैं कि कई खिलाड़ी उस सम्मान को या मेडल को बेच भी देते हैं। मैं एक ऐसा मुकुट मिलने वाला है जो अमूल्य है।
  5. दृढ़ता: विपरीत परिस्थितियों में भी दृढ़ रहे। कभी हौसला ना हारे। कई बार हम हताश हो जाते हैं पर मैं परमेश्वर हमें शक्ति देगा। क्योंकि मैं मान चुका हूँ कि न मृत्यु और न जीवन, न स्वर्गदूत और न शासन करने वाली आत्माएँ, न वर्तमान की कोई वस्तु और न भविष्य की कोई वस्तु, न आत्मिक शक्तियाँ। (रोमियों 8:38)
  6. धार्मिकता: कहता है कि हम परमेश्वर को संतुष्ट करें ना ही अपने आप को जैसे कि शमूएल ने कहा था कि परमेश्वर तू बोल तेरा दास सुन रहा है।
  7. भाईचारे का प्रेम: एक दूसरे को माफ करने की इच्छा
  8. प्रेम : परमेश्वर की आज्ञाकारिता हमारे परमेश्वर के प्रति प्रेम को दिखाता है और दूसरों की भलाई चाहना यह दर्शाता है कि हम एक दूसरे से प्रेम करते यह दर्शाता है कि हम एक दूसरे से प्रेम करते हैं।

आत्मिक उन्नति का नतीजा

क्योंकि यदि ये गुण तुममें हैं और उनका विकास हो रहा है तो वे तुम्हें कर्मशील और सफल बना देंगे तथा उनसे तुम्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह का परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त होगा

(2 पतरस 1:8)

यदि आप इन गुणों को धारण करते हैं तो आप परमेश्वर के पहचोन मे निक्कमे या निष्फल नहीं रहेंगे। उनके पास यह गुण नहीं है वह धुन्धली दृष्टि वाला और अंधे हैं, वह भूल गए हैं कि परमेश्वर ने उन्हें उनके पाप से छुड़ाया है। एक अंधा व्यक्ति जिसको आंशिक रूप से चंगाई मिली थी वह पेड़ और व्यक्ति में फर्क नहीं कर पा रहा था। वैसे ही अंधे लोग अस्थाई और अनंत काल की पहचान नहीं कर पाते।

धुन्धली दृष्टि वाले सिर्फ अस्थाई वस्तु देख पाते हैं। यदि हम हमेशा याद रखें कि परमेश्वर ने हमें पाप के कितने गहरे खाई से बचाया है तो हम हमेशा विनम्र रहेंगे।

निष्कर्ष

यदि हम इस लघु जीवन मे आराम को ज्यादा ध्यान देंगे तो हम असंतुष्ट रहेंगे। उसके बजाय हम अपने मसीही जीवन के लक्ष्य पर ध्यान दें जो है यीशु के दिव्य स्वभाव का सहभागी बनना। परमेश्वर ने इस लक्ष्य को पहुंचने के लिए हमे सारे प्रावधान दिए हैं। परमेश्वर अपने गुण हम से बांटना चाहते हैं, जैसे विनम्रता, करुणा, उसकी दया नम्रता, प्रेम, उसकी माफी, शांति, पिता पर विश्वास, निष्पक्षता एवं दूसरों को प्रोत्साहन करना।

उसकी महिमा हमारे जीवन में दिखनी चाहिए। यह निर्णय हमारा है पर हमें इसके लिए ईमानदारी से काम करना होगा।

यदि हम अंत तक दृढ़ता के साथ अपने प्रारम्भ के विश्वास को थामे रहते हैं तो हम मसीह के भागीदार बन जाते हैं। (इब्रानियों 3:14) दृढ़ता से अपने विश्वास को थामे रहे, परमेश्वर ने हमें स्वतन्त्र इच्छा और अच्छी चेतना दी है वह कभी हम पर जबरदस्ती नहीं करेगा।

हम जहां पर हैं वह हमारे पीछे लिए हुए फैसलों का निष्कर्ष है। आप मे से कई लोग आज जहाँ बैठे हैं, वहां नही हो सकते थे परन्तु आपने अपने अंतरात्मा में परमेश्वर की आवाज और उसके वचन को सुना और जवाब दिया। ऐसे ही जो निर्णय हम आज लेंगे वह हमारे कल और अनंत काल को रूप देगा। हमारे पास एक ही जीवन है, हमने परमेश्वर की बुलाहट की आशा को सुना, वही है परमेश्वर में सहभागी बनना।

हमारा ध्यान दुनिया की अस्थाई वस्तुओं पर था। वीडियो या फोटोग्राफ्स की तरह हम बार-बार दोबारा नहीं वीडियो या फोटो ले सकते।

उदाहरण के तौर पर अगर माता पिता डॉक्टर है और उन्होंने एक अच्छा हॉस्पिटल बनाया है अपने बेटे को और बेंगलुरु में मेडिकल की पढ़ाई के लिए भेजते हैं पर वह पथभ्रष्ट हो जाता है और 10 साल के बाद वापस आता है। पिता दुख से कहता है कि तूने क्या कर दिया हमारे पास कितनी अच्छी योजनाएं थी तेरे लिए, तूने सब नाश कर दिया।

जब हम परमेश्वर के सामने खड़े होंगे परमेश्वर भी हमें हमारे लिए परमेश्वर की सारे जो योजनाएं थी वह दिखाएंगे, पर आप दूसरे दिशा में चले गए, बहुत दुख की बात है।

इसलिए हे भाइयो, यह दिखाने के लिए और अधिक तत्पर रहो कि तुम्हें वास्तव में परमेश्वर द्वारा बुलाया गया है और चुना गया है क्योंकि यदि तुम इन बातों को करते हो तो न कभी ठोकर खाओगे और न ही गिरोगे, और इस प्रकार हमारे प्रभु एवम् उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनन्त राज्य में तुम्हें प्रवेश देकर परमेश्वर अपनी उदारता दिखायेगा। (2 पतरस 1:10-‬11) ‬‬‬

क्या हम अनंत काल के जीवन में शानदार स्वागत, भव्य प्रवेश एवं स्वागत चाहते हैं या फिर चाहते हैं कि किसी तरह हम भी भरे हुए बस मे चढ जाएं।

आइए हम प्रार्थना करें परमेश्वर हमारी मदद करें कि मैं तेरे रखे हुए उस लक्ष्य को पहुंच जाऊं। हर दिन हमें उस लक्ष्य के करीब ले जाए।

परमेश्वर आपको आशीष दे।

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