जब विश्वास और प्रेम टूट जाता है

House of Prayer
Sep 22 · 1 minute read

हाउस ऑफ प्रैअर

शमौन पतरस और यहूदा इस्करियोती यीशु के बारह शिष्यों में से दो थे। ये दोनों यीशु के क्रूस पर चढ़ाए जाने तक की घटनाओं में महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। वे दोनों यीशु की गिरफ्तारी और मुकदमे के आसपास की परिस्थितियों में बुरी तरह असफल रहे, लेकिन उनकी असफलताओं के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर था। एक को पुनःस्थापित कर दिया गया था, जबकि दूसरा खो गया था। पतरस ने विश्वास खो दिया था, लेकिन यहूदा ने प्रेम खो दिया था।

पतरस

मसीह की गिरफ्तारी के बाद पतरस का विश्वास डगमगा गया। लेकिन यीशु को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उसने इसकी भविष्यवाणी की थी: और प्रभु ने कहा, “शमौन, हे शमौन, देख, शैतान ने तुम लोगों को मांग लिया है कि गेंहूं की नाईं फटके। 32 परन्तु मैं ने तेरे लिये विनती की है, कि तेरा विश्वास जाता न रहे: और जब तू फिरे, तो अपने भाइयों को स्थिर करना।“ (लुका 22:31-32)

पतरस का विश्वास पूरी तरह से नहीं टूटा था, लेकिन उसे एक झटका लगा। उसने यह आशा छोड़ दी थी कि यदि वह यीशु के साथ रहेगा, तो वह अंत में विजयी होगा। यीशु को छोड़ने के बाद, पतरस ने तीन बार यीशु को जानने से इन्कार किया। उस शाम यीशु ने पतरस से कहा था कि वह तीन बार उसका इन्कार करेगा। यह जानते हुए भी कि उसने भविष्यवाणी पूरी कर दी है, पतरस, यीशु के पक्ष में खड़े होने का साहस नहीं जुटा सका। वह अब भी यीशु से प्रेम करता था, इसलिए वह फूट-फूट कर रोया, लेकिन उसका विश्वास टूट गया था।

शैतान ने सभी शिष्यों की परख की, लेकिन उसने शीर्ष नेता पतरस से शुरुआत की। पतरस कि परीक्षा के कुछ पहलू अय्यूब के समान थे। यहाँ शैतान की परख के बारे में पाँच बातें बताई गई हैं जो अय्यूब और लूका 22 की पुस्तक में देखी जा सकती हैं:

  1. शैतान को पतरस और अय्यूब कि परख करने के लिए परमेश्वर कि अनुमति लेनी पड़ी। परमेश्वर की अनुमति लिए बिना शैतान परमेश्वर कि संतान पर सताव नहीं ला सकता। ईश्वरीय अनुमति के बिना, अपने चुने हुए के चारों ओर परमेश्वर की सुरक्षा की दीवार में शैतान प्रवेश नहीं कर सकता।
  2. परमेशवर कभी-कभी ‘हाँ’ कहते हैं। परन्तु वह हर बार शैतान को अनुमति नहीं देते क्योंकि वह अपने प्रत्येक सेवक की ताकत और कमजोरियों को समझते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर अक्सर शैतान के अनुरोधों को अस्वीकार कर देते हैं। परन्तु, दुर्लभ अवसरों पर, परमेश्वर शैतान को वह पहुँच प्रदान करते हैं, जो वह चाहता है।
  3. प्रलोभन द्वारा, परख में शैतान और परमेश्वर दोनों का अपना उदेश्य है। शैतान का लक्ष्य परमेश्वर के सेवक को आत्मिक रूप से घायल करना है, जबकि परमेश्वर का लक्ष्य उसे राज्य के लिए और भी अधिक प्रभावशाली पात्र बनाना है।
  4. परख के दौरान, यीशु प्रभु हमारे लिए प्रार्थना करते हैं। यीशु ने पतरस से वादा किया था कि वह उसके लिए प्रार्थना करेंगे, और वह हमारे लिए भी प्रार्थना करते हैं।
  5. जब आप नए सिरे से विश्वास में यीशु के पास लौटेंगे तो आप अपने भाइयों को मज़बूत करेंगे। परखे हुए व्यक्ति ही दूसरों को मज़बूत करते हैं, बलवान नहीं।

यहूदा

पतरस के विपरीत जिसने विश्वास खो दिया, यहूदा इस्करियोती ने यीशु के लिए प्रेम खो दिया। बारह प्रेरितों में से एक के रूप में, यहूदा एक हिस्सा बनने के लिए संघर्ष किया। यीशु के आंतरिक समूह में पतरस, याकूब और यूहन्ना शामिल थे। यहूदा को लगा जैसे वह परिधि पर है। हालाँकि वह सेवकाई के कोषाध्यक्ष थे, उसने यीशु द्वारा अनुमोदित महसूस करने के लिए संघर्ष किया। यहूदा को अपना अंतिम झटका बेथानी में एक विशेष रात्रिभोज के दौरान लगा, जहां मैरी ने अत्यधिक महंगा इत्र का तेल से यीशु प्रभु का अभिषेक किया। यहूदा ने गरीबों की मदद करने के अपने जोश से यीशु को प्रभावित करने की बात कही – “यह इत्र तीन सौ दीनार में बेचकर कंगालों को क्यों न दिया गया? यह एक साल की मजदूरी के लायक था।” (यूहन्ना 12:5) यीशु ने तुरंत उसे डांटा, “उसे अकेला छोड़ दो,” यीशु ने उत्तर दिया। “उसे मेरे गाड़े जाने के दिन के लिये रहने दे। क्योंकि कंगाल तो तुम्हारे साथ सदा रहते हैं, परन्तु मैं तुम्हारे साथ सदा न रहूंगा ।” (यूहन्ना 12:7-8) यहूदा ने सार्वजनिक रूप से मरियम को डांटा, इसलिए यह उचित ही था कि उसकी फटकार उसी तरह से दी जाए। लेकिन इस डांट ने उसे चिढ़ा दिया। यीशु की डांट के वजह से यहूदा का जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदल गया। उसने शायद सोचा, “यीशु के साथ, मेरा कोई भविष्य नहीं है। मुझे लगता है कि वह एक अद्भुत व्यक्ति हैं, हालांकि टीम में मेरी उन्नति के लिए कोई जगह नहीं है। मुझे नहीं लगता कि मुझे यीशु के साथ उस तरह की मित्रता और कृपा कभी मिलेगी जिसकी मुझे लालसा थी। यह जागने, टीम छोड़ने और अपने जीवन के साथ आगे बढ़ने का समय है।”

यहूदा, यीशु से ज्यादा खुद को प्रेम करता था। उसकी इच्छा यीशु के उद्देश्य को आगे बढ़ाने की नहीं थी,बल्कि स्वयं का फायदा और काम को आगे बढ़ाने की थी।

कभी आपने सोचा है कि चाँदी के तीस सिक्कों के लिए यहूदा ने यीशु को धोखा क्यों दिया? उसने शायद विश्वास किया होगा कि वह स्वयं और यीशु दोनों पर एक उपकार कर रहा है। यहूदा ने शायद तर्क दिया होगा, “चूंकि मैं किसी भी तरह टीम छोड़ रहा हूं, मैं इसे इस तरह से भी कर सकता हूं, जिससे यीशु को और मुझे भी फायदा हो। पैसा मुझे अपने भविष्य की ज़मानत देने में मदद करेगा, और यीशु के प्रति विश्वासघात एक कारण बने, जिससे यीशु दुनिया के सामने अपने आपको प्रकट करने के लिए प्रेरित होगा। यीशु हमेशा की तरह गिरफ्तारी से बच जाएगा, और सबसे अधिक संभावना है कि वह दुनिया को अपने इरादों को साफ ज़ाहिर करेंगे।”

क्योंकि उसने यीशु के लिए अपना प्रेम खो दिया था, यहूदा ने उसे धोखा दिया। सबसे अधिक संभावना यह है कि उसे अभी भी यीशु पर विश्वास था, लेकिन अब वह उससे प्रेम नहीं करता था।

यदि आप विश्वास खो देते हैं, तो यीशु आपके लिए मध्यस्थता कर सकते हैं। दूसरी ओर, यदि आप अपना प्रेम खो देते हैं तो आप क्या कर सकते हैं?

यहूदा ने क्रूसारोहण से पैसा कमाया। यीशु ने धन को “अधर्मी देवता” (लूका 16:9) के रूप में संदर्भित किया, जिसका अर्थ है कि इसमें एक स्वाभाविक दोष है। पैसे के लिए यीशु प्रभु को क्रूस पर चढ़ाया गया था। पैसे को संभालते वक्त हमारे हाथ कांपने चाहिए।

पतरस और यहूदा के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है।

शैतान को पतरस को कष्ट द्वारा परीक्षा में डालने या सताने की अनुमति माँगनी पड़ी, लेकिन वह बिना पूछे ही यहूदा में प्रवेश कर गया (यूहन्ना 13:27)। उसे यहूदा में प्रवेश करने के लिए ईश्वरीय अनुमति की आवश्यकता क्यों नहीं थी? उत्तर धन का पेटी से जुड़ा हुआ है।

यहूदा यीशु का कोषाध्यक्ष था। उसे सेवकाई के धन को संभालने कि जिम्मेदारी थी। उसने यीशु के निर्देशों के अनुसार धन को विभाजित किया। उसने उस धन से चोरी भी की। (यूहन्ना 12:6)। ऐसा नहीं है कि चोरी करना एक विशेष रूप से घृणित या अक्षम्य पाप था। समस्या यह थी कि, कबूल करने और पश्चाताप करने के बजाय, यहूदा ने जानबूझकर अपने पाप को छुपाया। उन्हें पश्चाताप करने के कई मौके दिए गए, लेकिन उसने अपने पापों को प्रकाश में लाने से इनकार कर दिया। वह अपने पापों को छिपाता रहा।

दूसरी ओर, पतरस एक खुली किताब के समान था। पतरस के मुद्दे उतने ही गहरे थे लेकिन उसने यीशु को उसे देखने और उसे संबोधित करने दिया। उसके पास बहुत सारी समस्याएं थीं लेकिन कोई रहस्य नहीं था।

दूसरी ओर, यहूदा बहुत सी बातें छिपाता था। उसने अपनी चोरी को यीशु से छुपाया। उसने शायद अपने मन में यह सोचा, “यीशु को पता भी नहीं है कि मैं चोरी कर रहा हूँ क्योंकि अगर ऐसा होता, तो वह मुझे धन संभालने कि जिम्मेदारी नहीं देता। हर कोई मानता है कि वह सर्वज्ञानी है, फिर भी उसे पता नहीं है कि उसका अपना ही कोषाध्यक्ष, धन-पेटी से चुरा रहा है! वह उतना भी सर्वज्ञानी नहीं है जितना हर कोई मानता है।”

क्योंकि यहूदा ने पश्चाताप करने और प्रकाश में चलने से इनकार कर दिया था, शैतान बिन बुलाए उसमें प्रवेश करने और उसे अपनी मौत तक घसीटने में सफल रहा।


हम यहूदा से क्या सीख सकते हैं? यीशु से कभी भी और कुछ भी छिपाना मत। कोई रहस्य न रखें। यहां तक ​​कि अगर आप महसूस करते हो कि आप पाप के गुलाम बन गये हो और यह नहीं जानते कि कैसे मुक्त होना है, तो प्रकाश में चलने का हार्दिक निर्णय लें। कुछ इस तरह से प्रार्थना करें: “यीशु, मुझे यह समस्या हो रही है। मैं इसे आपको दिखाने जा रहा हूं। कृपया मुझे बदलने और इस पर जीत प्राप्त करने में मदद करें!”

यीशु से प्रेम करो, उस पर विश्वास करो और उसे अपना सब कुछ प्रकट करो। यदि आप ऐसा करते हैं, तो वह आपको सहायता करेगा।

अनुवादक – बिन्दु सूसन

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